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  • Pramod Pandey

परिवार की दिनचर्या का बच्चों पर प्रभाव


ऐसे बहुत सारे अभिभावक है जो परीक्षा के समय यह शिकायत करते है कि:-

१. मेरे बच्चे के ऊपर परीक्षा का बहुत दबाव है

२. मेरा बच्चा कोर्स ही पूरा नहीं कर पाता है।

३. परीक्षा की समुचित तैयारी न हो पाने के कारण इस समय बच्चे की पूरी दिनचर्या अस्त-व्यस्त हो चुकी हैं।

४. मेरे बच्चे को सारी-सारी रात पढ़ना पड़ता है।

५. मेरे बच्चे को परीक्षा के दौरान सारी रात जागने के कारण उसके पाचनतंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ता है जिसके कारण बच्चे के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हैं।

६. बच्चे अत्यंत तनाव में रहते है।

उपरोक्त समस्याओं के सम्बन्ध में जब अभिभावक और बच्चो से उनके समस्यात्मक पृष्ठभूमि के बारे में विश्लेषणात्मक बातचीत की गई तो ढेर सारी व्यवहारात्मक समस्याओं के साथ वे स्व-अनुशासन की भी समस्या भी प्रभावी रूप से अपनी भूमिका अदा कर रही थीं। जिसके कारण बच्चे मनोनुकूल परिणाम नहीं पाते हैं एवं इसका परिणाम उनके मानसिक स्वास्थ्य और दैनिक समायोजन पर भी पड़ता है।

स्व-अनुशासन विद्यार्थी जीवन में व्यवहार परिमार्जन का एक महत्वपूर्ण आयाम है जो विद्यार्थियों को उनके कैरियर रूपी लक्ष्य प्राप्त करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता हैं। स्व-अनुशासन की नींव परिवार या अभिभावक से शुरू होकर विद्यालय होते हुए कार्यस्थल तक जाती है। स्व-अनुशासन परिवार की दैनिक दिनचर्या से शुरू होकर शैक्षिक जीवन, सामाजिक जीवन, कार्यस्थलीय जीवन, सांस्कृतिक जीवन, धार्मिक जीवन एवं पारिवारिक जीवन को प्रभावित करता है। अर्थात हम यह कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि स्व-अनुशासन का महल परिवार की दैनिक दिनचर्या की नींव पर ही खड़ा होता है। परिवार की व्यवस्थित दैनिक दिनचर्या बालमन पर जो प्रभाव एक बार डालती है उसका प्रभाव या लाभ वे अपने सारे जीवन पाते है।

इस प्रभावशाली पारिवारिक दैनिक दिनचर्या के कुछ मूलतत्त्व निम्न हैं:-

१. नींद का समय निश्चित:- जिन परिवारों में रात को सोने व सुबह जागने का समय निश्चित है, हम ऐसे परिवारों को व्यवस्थित दिनचर्या वाला परिवार कह सकते है। यदि किसी घर में बड़े सदस्य उम्र के अनुसार नींद पूरा करने वाली आदतों को महत्व दे रहे है तो उस परिवार के बच्चों पर उसका सकारात्मक असर पड़ता है। अर्थात बच्चें नींद ठीक समय पर पूरी कर रहे है। जिसके परिणामस्वरूप उनके विकासात्मक गतिविधियों में कोई बाधा नहीं आती हैं।

२. व्यवस्थित भोजन पद्धति:- परिवार की दैनिक दिनचर्या यदि ठीक है तो बच्चों में सामूहिक भोजन शैली का विकास होता है और सामूहिक भोजन से बच्चें जहाँ सुबह का नाश्ता, लंच व डिनर तीनो समय भोजन लेने की पद्धति विकसित होती है वही कई लोगो के साथ खाते समय वे अपनी मात्रा भी लगभग पूरी कर लेते है। सामूहिक भोजन से स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का भी विकास होता हैं।

३. शारीरिक खेल-कूद:- बाल्यावस्था में शारीरिक खेल-कूद बच्चों के लिए व्यायाम व मनोरंजन दोनों दृष्टि से लाभकारी होता है। जहाँ बच्चों की खेलों में रूचि ज्यादा होती हैं वही आउटडोर गेम से बच्चों का शारीरिक व्यायाम भी हो जाता हैं। परिवार की दैनिक दिनचर्या में बच्चों के लिए खेल-कूद के लिए समय देना आवश्यक होता है जिससे वे स्क्रीन एडिक्शन से भी बचे अर्थात अभिभावकों को उन्हें पाँच इंच की दुनिया से निकाल कर पाँच एकड़ के मैदान में ले जाने की जरुरत हैं।

४. स्टडी टाइम:- जिन परिवारों की दिनचर्या व्यवस्थित होती है उन परिवारों में बच्चों को नियमित स्टडी के लिए भी टाइम का प्रबंधन किया जाता है। नियमित स्टडी टेबल पर बैठने के कारण परीक्षा के समय का तनाव बच्चों पर हावी नहीं हो पाता हैं।

५. समायोजन व प्रबन्धन:- शोधों से यह पता चला है कि जिन परिवारों में दैनिक दिनचर्या व्यवस्थित होती है उन परिवारों के बच्चों का समायोजन व प्रबन्धन का स्तर भी अच्छा होता है जिसका सीधा प्रभाव उनके निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ता है।

उपरोक्त दैनिक दिनचर्या के मूलतत्वों को देखने से यह पता चलता परिवार की दैनिक दिनचर्या का बालक / बालिका के विकासात्मक जीवन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।


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