• Pramod Pandey

कभी तो परहेज करें मोबाइल - लैपटॉप से

Updated: Jul 22, 2021


सुबह उठते ही आप पहला काम क्या करते है ? कभी लोग सुबह सबसे पहले व्यायाम करते थे, पढ़ना-पढ़ाना करते थे, भक्ति - भजन करते थे या कम से कम परिवार के साथ कुछ पल बिताने के लिए इकट्ठे होते थे। लेकिन आज अधिकांश लोग सुबह सबसे पहले क्या करते है ? वे सबसे पहले अपना मोबाइल खोलते है। व्हाट्सअप, फेसबुक, यूट्यूब, हेल्लो, इंस्टाग्राम, टवीटर, लिंकडिन जैसे ऐप हमें अपनी ओर खींचते है, और हम खींचे चले जाते हैं।

अब दृश्य नंबर दो:- नौ बजे के आस-पास आप दफ्तर पहुंचे। अब तक आप स्मार्ट फोन पर व्यस्त थे , और लीजिये अब शुरू हो गया आपका लैपटॉप या डेस्क्टॉप। लेकिन दिनभर बीच- बीच में स्मार्टफोन भी चलता रहा। शाम घर लौटे तो टी0 वी0 , स्मार्टफोन या अलेक्सा जैसे स्मार्ट स्पीकर। और हाँ , दिन भर में न जाने कितने फोन भी तो सुने। हालाँकि इन सब की उपयोगिता पर कोई शक नहीं है, लेकिन क्या सचमुच अपने दिन (रोज़मर्रा ) का इतना बड़ा हिस्सा इन्हे भेट कर देने का कोई अभिप्राय हैं? समस्या कितनी गंभीर है, इसे आकड़ो की मदद से जाने। ‘ईमाकेटर’ के एक अनुमान के मुताबिक, हम भारतीय वयस्क रोजाना चार घंटे चौतीस मिनट का समय मीडिया के इस्तेमाल पर खर्च कर रहे है। यानी देखने, सुनने, स्ट्रीमिंग करने और पढ़ने में। यह आंकड़ा २०१३ में सिर्फ दो घंटे बावन मिनट था। जो २०२० तक बढ़कर ५ घंटे १० मिनट हो गया है। अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय और इंडियन कॉउंसिल ऑफ़ सोसल साइंस रिसर्च के एक शोध के अनुसार, ६३ फीसदी छात्र रोजाना ४ से ७ घंटे तक का समय स्मार्टफोन पर खर्च करते है। आज के आकड़ो को देखा जाय तो प्रिंट मिडिया पर खर्च होने वाला समय (१२ मिनट) के बाद सबसे कम यानी १६ मिनट है। हर ४ में से एक इंसान सोने से ज्यादा वक्त स्मार्ट गैजेट्स पर खर्च करता है। इसका मतलब यह हुआ की हममे से ज्यादातर लोग सोने, कामकाज और जरुरी गतिविधियों पर खर्च होने वाले समय के बाद अपना बचा-खुचा लगभग सारा वक्त इन्ही चीजों के हवाले कर देते है। बहुत से क्षेत्रो में तो नौकरी का समय ही इतने घंटे का होता हैं। मतलब यह की आप अपनी नौकरी के अलावा एक नौकरी इन गैजेट्स और स्क्रीन पर भी कर रहे है। गैजेट्स और स्क्रीन के प्रति हमारी बढ़ती निर्भरता के बड़े नुकसान है। यह हमारी सेहत को प्रभावित कर रही है। मानसिक तनाव पैदा कर रही है तो दिल, शरीर और दिमाग की समस्याओ को जन्म दे रही है। यह रिश्तो में दूरिया पैदा कर रही है। बच्चो को पढ़ाई-लिखाई से दूर कर रही है, दफ्तरों में उत्पादकता का स्टार घटा रही है और हमारी तर्कशीलता को भोथरा कर रही है। यह हमें एक लत का शिकार बना रही है तो कुछ मामलो में हम पर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है और एक देश के रूप में देखे तो हमारी कुल उत्पादकता और उसके नजीतन तरक्की को भी प्रभावित कर रही है। आज हमें आधुनिक उपकरणों की गुलामी से मुक्ति पाने की जरुरत है। दुनिया भर के लोग इसके लिए कुछ तरीके आजमा रहे है, जिन्हे हम भी आजमा सकते है। कुछ देशो में तो लोग एक-दो हफ्तों के लिए गैजेट्स रहित छुट्टी पर जाने लगे है। शायद आपके लिए ये संभव न हो, लेकिन इन उपायों को आप जरुर उपयोगी पाएंगे ; -

१. गैजेट्स के लिए समय निश्चित करना: क्या आप अपने दिन का एक समय गैजेट्स के लिए निश्चित कर सकते है, मसलन आधा या पौना घंटा? यानी शाम सात बजे के बीच ही आप अपने व्हाट्सप्प, फेसबुक, और इन्स्टाग्राम सन्देश देखेंगे। उसके अलावा बाकी समय ये बंद रहेंगे। फोन आने पर फोन उठाना मजबूरी है, लेकिन स्क्रीन से जुड़ी बाकी गतिविधियां सीमित कर देंगे। टेलीविज़न का समय आधा घंटा, जैसे नौ से साढ़े नौ।

२. रात के समय गैजेट्स को दूर और बंद रखना: न सिर्फ वे हमें रात में परेशान करेंगे और सेहत को नुकसान पहुँचायेंगे बल्कि हमारी नींद में भी खलल डालेंगे इसलिए उन्हें तकिये के पास रखने का भी कोई तुक नहीं।

३. गाड़ी चलाते समय फोन नहीं उठाना: इस दौरान फोन से दूर रहे और तमाम आकर्षण के बावजूद आप उसे ना उठाये, बशर्ते किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति का फोन ना हो।

४. भोजन के समय फोन को आस-पास न रखें: परिवार के साथ भोजन कर रहे है तो यह शर्त लगा दे कि किसी के हाथ में फोन नहीं होना चाहिए।

५. सप्ताह में एक दिन डिजिटल डेटॉक्स का रखें: उस दिन आप इसका कतई इस्तेमाल नहीं करेंगे। न सोशल मीडिया, न ईमेल, न टेलीविजन, न कम्प्यूटर, न फोन, न व्याट्सएप्प, न एसएमएस। वह दिन परिवार के साथ बिताये, सही अर्थो में।

६. दफ्तर में निरंतर कंप्यूटर के सामने ना बैठे रहे: हर बीस मिनट में एक बार उठे और बीस कदम टहले। अपनी नजरे भी बीच-बीच में कम्प्यूटर से हटाये और दुसरी तरफ देखे। दफ्तर में लंच करते हो तो अपनी टेबल पर नहीं बल्कि कैफेटेरिया, कैंटीन या किसी दूसरी जगह पर जाकर करे।

७. लोगो से मिलने -जुलने में दिलचस्पी ले: बहुत सारी चर्चाये खुद इतनी दिलचस्प होती है कि आपको अपने गैजेट्स याद नहीं सताएगी।

८. शारीरिक गतिविधियों, खेलकूद और मनोरंजन के दूसरे माध्यमों की ओर लौटे: गैजेट्स और स्मार्ट स्क्रीन हमें शारीरिक रूप से निष्क्रिय बना रही है। यह मोटापे, दिल की बीमारी, मधुमेह, और ऐसी ही दुसरी समस्याओ की जड़ है। थोड़ा खेलकूद की तरफ लौटे। वे दिन भी क्या थे जब लोग इकट्ठे हो कर वॉलीबाल, फ़ुटबाल, क्रिकेट, बैडमिंटन और शतरंज आदि खेला करते थे।

९. एक दोस्त बनाये जो आपकी ही तरह गैजेट्स से आजादी चाहता हो: उसके साथ अपने अनुभवों को बांटे और एक दूसरे को प्रेरित करे। इस मामले में अगर प्रतिद्वंदिता भी हो तो कोई हर्ज नहीं।

१०. कभी- कभी अपने गैजेट्स को घर छोड़ जाए: जी हाँ, जान-बूझकर। जब हाथ में गैजेट्स होगा ही नहीं तो आप इस्तेमाल भी नहीं करेंगे। हालाँकि आपको उसकी याद आएगी, लेकिन क्या करेंगे, मजबूरी होगी।

११. सबको बता दे की आप डिजिटल डेटॉक्स कर रहे है: कई बार लोग ही आपको गलत आदतों के लिए प्रेरित करते है। आपकी स्पष्टता उनको ऐसा करने से रोकेगी और अगर उन्हें बता देते है तो आप भी अपनी बात पर टिके रहने के दबाव में होंगे।

तो क्यों न आज ही आप अपने गैजेट्स की सूची बनाये ताकि आपको पता लगे कि कितना समय इन सब पर खप रहा है।

साभार - श्री बालेन्दु शर्मा दाधीच (प्रकाशित : पाञ्चजन्य ७ फरवरी २०२१, पृष्ठ -४६ )

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