• Pramod Pandey

अभिभावकीय शैली एवं उनका प्रभाव

एक आठ वर्षीय लड़की रिया अपने कुछ दोस्तों से बाते करते हुये कह रही थी कि मेरी मम्मी तो मुझे दिन भर डाटती ही रहती, मुझे बिलकुल भी प्यार नहीं करती। उनसे अच्छे तो मेरे बगल वाली आंटी जो मुझे मम्मी से ज्यादा प्यार करती हैं।" नौ वर्षीय प्रफुल्ल अपने एक अंकल से बात करते हुए कहा कि "अंकलजी घर जाना है डॉन के आने का समय हो चुका हैं।" जब पूछा गया कि डॉन कौन ? तो मुस्कुराते हुये बताया कि अपने पापा को ही हम लोग डॉन कहते है क्योकि वे जब घर में रहते है तो सारे घर में अनुशासन के नाम पर अजीब सी शांति छाई रहती है, घर के सभी बच्चे एकदम यंत्रवत रहते है, और उनकी भी ऐसी इच्छा रहती है की घर के लोग उनसे डरे।

१० वर्षीय राहुल अपने एक मित्र से खेलते समय लड़ाई कर लिया और धमकी भरे अंदाज में बोला कि "हमारे पापा तुम्हे देख लेंगे। "

उपरोक्त कुछ परिस्थितियो में बच्चो द्वारा कहे गए कथनो पर यदि गौर किया जाय तोबच्चो का अपने माता-पिता के प्रति भाव कैसा है ? आगे चलकर उनके प्रति बच्चो का रवैया कैसा होगा ?या इन मनःस्थितियो का उनके व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? आदि कुछ जटिल प्रश्नो का वर्तमान समय के अभिभावकों को सामना करना पड़ता है।वर्तमान समय में पैरेंटिंग काफी कठिन प्रक्रिया हो चुकी है। तब जबकि स्वभावतः पैरेंटिंग को लेकर कोई व्यवस्थित व पारम्परिकप्रशिक्षण की व्यवस्था नहीं है।या जो है भी वहा जाने में हमें बहुत ही असहजता महसूस होती है।कभी कभी हमारे द्वारा किये गए व्यवहार बच्चो के लिए ठीक है या नहीं ? इसका निर्धारण हम नहीं कर पाते।हमारे द्वारा किया गया व्यवहार बच्चो के लिए कितना सकारात्मक या नकारात्मक होगा ? इसका अनुमान लगाना हमारे लिए मुश्किल हो जाता है। कुछ पैरेंटिंग के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों ने माता-पिता काबच्चो के प्रति किये गए व्यवहारों का विस्तृत अध्ययन करके उन्हें श्रेणीकृत करने की कोशिश की है। अलग-अलग विद्वानों ने विभिन्न प्रकार के पैरेंटिंगव्याख्या उनके गुणों और दोषों के आधार पर की है।जिसको समझने से हमारी अभिभावकीय दक्षता में निपुणता आती है और हमें एक सफल पैरेंट बनने में मदद मिलती है।

आप किस तरह के माता-पिता है?

पैरेंटिंग के क्षेत्र में काम करने वाले शोधकर्ताओं ने मुख्यतः चार तरह की पेरेंटिंग स्टाइल की चर्चा की है जिसके अपने फायदे व नुकसान है। माता पिता को बच्चो के विभिन्न विकास को ध्यान में रखते हुए समय एवं परिस्थितियों के अनुसार पेरेंटिंग स्टाइल अपनाते है तो ज्यादा लाभ होता है। पैरेंटिंग की चार श्रेणियाँ निम्न है :-

1. Authoritarian Parenting:- इस तरह के माता-पिता अति अनुशासनप्रिय होते है। वे बच्चो के साथ नियम, अनुशासन एवं सख्ती में ज्यादा विश्वास रखते है। इनके व बच्चो के मध्य संचार एकतरफा होता है अर्थात ये जल्दी बच्चो का विचार सुनना नहीं पसंद करते है। सिर्फ अपनी राय ही बच्चो पर थोपते है। ये अपने बच्चो से उम्मीदे बहुत बना के रखते हैं। साथ ही इनकी मनोवृति बच्चो को लेकर समझौतावादी नहीं होती है। ऐसे माता-पिता द्वारा परवरिश किये हुए बच्चो का शैक्षणिक प्रदर्शन कमजोर होता है। इनका सामाजिक कौशल भी कम ठीक होता है। ऐसे बच्चे कभी-कभी मानसिक बीमारी के शिकार हो जाते है साथ ही नशा व बालअपराध की तरफ अग्रसर होते हुए भी देखा गया है।

2. Authoritative Parenting:- इस तरह के माता-पिता अनुशासनप्रिय होते है और बच्चो पर नियम कानून लागू करते है परन्तु नियमो को बनाने में बच्चो की सहमति भी लेते है और उन्हें पूरा करने में उनकी मदद भी करते है। साथ ही बच्चो से स्वस्थ संवाद भी बनाये रखते है। ऐसे माता-पिता बच्चो से उम्मीदे तो करते है परन्तु उन उम्मीदों को पूरा करने के प्रयासों में माता-पिता उनके साथ होते है। ऐसे माता-पिता द्वारा परवरिश किये हुए बच्चे लचीले व लक्ष्य के लिए सक्षम होते है साथ ही उनका आत्मविश्वास भी पर्याप्त होता है।

3. Permissive Parenting:- ऐसे माता-पिता जो बच्चो को सदैव स्वतंत्रता प्रदान करने में ज्यादा विश्वास करते है। साथ ही जब बच्चो को आवश्यकता पड़ती है वे उन्हें सहयोग, मार्गदर्शन एवं दिशा भी प्रदान करते है। ऐसे माता-पिता बच्चो के साथ मित्रवत व्यवहार करते है। ये अपने बच्चो के साथ सदैव घनिष्ठ व भावनात्मक सम्बन्ध विकसित करते है। ऐसे माता-पिता काफी क्षमावान होते है। इनका बच्चो के प्रति जो मनोवृति होती है उसके अनुसार "बच्चे तो बच्चे ही रहेंगे। " ऐसे माता-पिता द्वारा परवरिश किये गए बच्चो का व्यवहार अत्यंत आवेशपूर्ण एवं अहंकारी होता है। ऐसे बच्चो का सामाजिक समायोजन का स्तर भी काफी कमजोर होता है। ऐसे बच्चो का सामाजिक सम्बन्ध समस्यात्मक होते हुये भी देखा गया है किन्तु ऐसे बच्चे जिम्मेदार, ऊर्जावान व लचीले भी होते हुए पाए गए है।

4. Uninvolved Parenting:- ऐसे माता-पिता अपने बच्चो के जीवन में कोई भावनात्मक भागीदारी नहीं रखते। बच्चो की वास्तविक आवश्यकताओं को पूरी तो करते है किन्तु उनके किसी भी निर्णय में उनका न तो सहयोग करते है ना ही उनकी किसी गतिविधि में शामिल होते है। ऐसे माता-पिता के लिए विशेषज्ञों ने कहा है कि यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि ऐसे माता-पिता न तो पैरेंटिंग जानते है ना ही पैरेंटिंग में कोई रूचि रखते है। मनोवैज्ञानिकों ने ऐसे पैरेंट को मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता के सम्पर्क में रहने की सलाह देते है अन्यथा इनके बच्चे आगे चलकर अपना आत्म-सम्मान या आत्म-नियंत्रण खो देते है। ऐसे बच्चे आवेगात्मक व्यवहार करने वाले , नशोन्मुखी व बाल-अपराधी होने की सम्भावना बढ़ जाती है। ऐसे बच्चो में कभी-कभी आत्महत्या की मनोवृति भी विकसित होते हुए देखी गई है।

वर्तमान समय में उपरोक्त के अतिरिक्त भी कई पेरेंटिंग स्टाइल की चर्चा या प्रयोग होते हुए देखा गया हैं जैसे; हेलीकॉप्टर पेरेंटिंग, लानमूवर पैरेंटिंग या टाइगर पेरेंटिंग इत्यादि। अभिभावकों के लिए कोई भी एक अभिभावकीय कुशलता पूर्ण नहीं होती। बल्कि समय, काल एवं परिस्थितियों के अनुसार पेरेंट्स में पैरेंटिंग स्टाइल को चुनने की दक्षता होनी चाहिए या उनको समय-समय पर बाल -विशेषज्ञ या मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता से सहयोग लेना चाहिए जिससे बच्चो के भविष्य को सही दिशा दी जा सके।


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